ह्रदय परिवर्तन एक सच्ची गाथा -- महेश राजा

रिपोर्ट मनप्रीत सिंह


रायपुर छत्तीसगढ़ विशेष : विश्व और देश के हालात दिन ब दिन बिगड़ रहे थे। भयानक वायरस का  संक्रमण  तेजी से बढ़ रहा था।मौत की सँख्या  भीबढ़ती  चली जा रही थी।


     आपातकाल जैसी स्थिति का सामना कर रहे  आम लोगों की स्थिति बहुत कठिन थी।सब्जियोँ और  रोजमर्रा की किराना वस्तु ओं की कीमतें आसमान को छू रही थी।


    ऐसे समय  मेंकुछ लोग कालाबाजारी और वस्तुओं की कमी को  दर्शा कर मनमानी कीमतें वसूल रहे थे।दुकानदार और ग्राहकों में रोज तू तू मैं मैं बढ़ती जा रही थी।लाकड़ाउन होने से काम धंधे भी बंद थे।लोगों के पास रूपयों की भी कमी हो रही थी।दुकानदार कहता ,लेना हो तो लिजिये,कल को शायद यह भी न मिले या वे तर्क देते थे कि उपर से ही माल नहीं आ रहा है,तो हम क्या करें।इस तरह से  वेदुगनी कीमतें वसूल रहे थे।लोग विवश थे।सामग्री खरीदने को मजबूर थे।


   प्रशासन भी इस तरफ़ ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा था।क्योंकि समस्याएं बड़ी और ज्यादा विकट थी।अपनी तरफ़ से आदेश जरूर पारित किये थे कि उचित मूल्य पर ही वस्तुएं बेचे।


   बाजार से सेनेटाइजर और मास्क गायब थे। कहीं मिल भी जाये तो अधिक मूल्य में बेचा जा रहा था।कुछ भले लोग भी थे जो अपनी तरफ़ से मास्क और सेनेटाइजर बाँट रहे थे।


    ऐसे ही एक व्यापारी और उनके दो पुत्र दुकान बढा़कर इस विकट स्थिति पर विचार कर रहे थे।लड़के नयी पीढ़ी से थे।तुरंत के फायदे को देखते थे ।वे सोच रहे थे , किकुछ जरूरी वस्तुओं का संग्रह कर या बाजार से गायब कर फिर उसे जनता में मनमानी कीमतों में बेचा जायें।


   व्यापारी पिता ने जमाना देखा था।धूप में बाल सफेद किये थे। उन्हें यह बात मंजूर नहीं थी।वे तर्क दे रहे थे,इस कठिन समय में हमें देश के कँधे से कँधा मिलाकर सबकी मदद करनी चाहिए।तभी यह कठिन समय गुजर पायेगा।
     उन्होंने बेटों को समझाया कि
परिवार ने अभी अभी एक विपदा को देखा है।आगे ऐसे कठिन समय में हम अपना स्वार्थ देखेंगे तो ईश्वर हमें कभी माफ नहीं करेगा।


 रात भर इस बारें में विचार विमर्श होता रहा।  आखिर कारबच्चों ने पिता की बात स्वीकार ली।


   दूसरी सुबह पिता और दोनों पुत्र समय पर दुकान पहुँचे।उचित दूरी के निशान लगवाये।स्टाफ और स्वयं मास्क और दस्ताने पहन कर उचित मूल्य पर सामान की बिक्री  करने लगे।


  बुजुर्ग ने अपनी तरफ़ से गरीबों के लिये चावल,गेंहू और दाल शासन को भिजवायें।
   
   ऐसा करते हुए उनके चेहरे पर असीम संतोष था।दोनों पुत्र भी पूर्ण श्रद्धा से सबकी सेवा में जुटे थे।


     आज रामनवमी का पावन त्यौहार था।सब जगह उन्होंने घी के दिये प्रगटायें और पूरे परिवार के साथ श्री रामचंद्र जी की पूजा की।तथा समस्त विश्व के स्वास्थ्य  और स्थिति शीध्र सामान्य हो;इसके लिये प्रार्थना की।



........


*महेश राजा*,वसंत 51/कालेज रोड़।महासमुंद।छत्तीसगढ़।।


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