युवा लेखक बलवंत सिंह खन्ना की कलम से लेख --- एक तो सर्वव्यापी कोरोनो काल का कहर और ऊपर से महंगाई की मार


Report manpreet singh 


Raipur chhattisgarh VISHESH :कोरोना वायरस जैसी गंभीर वैश्विक महामारी से हर कोई परिचित है। सरकार द्वारा इसको फैलने से रोकने के लिये अलग अलग चरणों मे लॉकडाउन किया गया। इसके अतिरिक्त भी कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। देश मे आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू है।


आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955...


आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955, को भारत की संसद द्वारा 1955 में पारित किया गया था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है लोगो को वस्तुओं की आपूर्ति उचित मूल्यों पर निरन्तर उपलब्ध हो । सरकार की देख-रेख में इस कानून के तहत 'आवश्यक वस्तुओं' की बिक्री, उत्पादन, आपूर्ति आदि को आम जनता के हित के लिए नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के तहत ये ध्यान दिया जाता हे कि उपभोक्ताओं को सही कीमत पर चीजें मिल रही हैं या नहीं। इस कानून के तहत केंद्र सरकार के पास अधिकार होता है कि वह राज्यों को स्टॉक लिमिट तय करने और जमाखोरों पर नकेल कसने के लिए कहे ताकि वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित न हो और दाम भी ज्यादा ना बढ़े। 


                   जब कोई वस्तु सरकार द्वारा 'आवश्यक वस्तु' घोषित की जाती है, तो सरकार के पास एक अधिकार आ जाता है। उसके मुताबिक वस्तुओं का अधिकतम खुदरा मूल्य तय कर सकती है। लेकिन अगर कोई दुकानदार उस मूल्य से अधिक दाम पर चीजों को बेचता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जिसके बिना जीवन व्यतीत करना मुश्किल होता है। ऐसी चीजों को सरकार आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत आवश्यक वस्तु की सूची में डाल देती है। सरकार का मकसद है कि लोगों को जरूरी चीजें सही कीमत पर मिले। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को बनाने का मुख्य उद्देश्य यही था और यह आपदा के समय मूल्यों को नियंत्रित करने में मुख्य भूमिका निभाता है।


 


*अब बात आती है आवश्यक वस्तु की श्रेणी में शामिल वस्तुओं का नाम*


आवश्यक वस्तुओं में पेट्रोलियम (पेट्रोल, डीजल, नेफ्था और सोल्वेंट्स आदि), खाना (बीज, वनस्पति, दाल, गन्ना, गुड़, चीनी, चावल और गेहूं आदि), टेक्सटाइल्स, जरूरी ड्रग्स, फर्टिलाइजर्स शामिल है। सरकार द्वारा इस सूची में समय-समय पर बदलाव होता रहता है। हाल ही में सरकार ने मास्क और सैनिटाइजर को भी इस सूची में शामिल किया है। 


              जून माह में पेट्रोल और डीजल में हुई बेतहासा मूल्य वृद्धि चौकाने वाली बात है । वैश्विक महामारी से पूरा देश जूझ रहा है। अर्थव्यवस्था पर खासा असर पड़ा है। निम्न वर्ग के लिये आर्थिक समस्या सबसे ज्यादा है ऐसे समय मे जनता को राहत देनी चाहिये। लेकिन इसके विपरीत केंद्र सरकार लगातर पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में वृद्धि कर रही है। शायद इतिहास में पहली बार हो जब डीजल पेट्रोल से भी ज्यादा महंगा हुआ है।पेट्रोल डीजल की मूल्य वृद्धि को लेकर लोगो की भी अलग अलग राय है। कुछ दिनो से सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से पढ़ने को मिल रहा है कि जब शराब, सिगरेट, गुटका आदि के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है तब किसी को कोई फर्क नही पड़ा, तो पेट्रोल डीजल के मूल्य वृद्धि से इतनी हाय तौबा क्यूँ। लेकिन इन बुद्धिजीवियों को कौन समझाए की शराब , सिगरेट और गुटका आवश्यक वस्तुओं की सूची में नही आती है। इंसान बिना शराब के, बिना सिगरेट के रह सकता है। लेकिन बिना भोजन के नही रह सकता है। 


अगर पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में 1 रुपए की भी वृद्धि होती है तो इसका सीधा असर हमारे दैनिक उपयोग की वस्तुओ के मूल्यों पर भी पड़ता है। मालवाहक गाड़ियों और यातायात के मूल्यों में वृद्धि होती है। अनाज, फल, सब्जियां सभी के मूल्य बढ़ने लगते हैं। जिसका सीधा असर प्रत्येक व्यक्ति की वित्तीय स्थिति पर पड़ती है। खासकर निम्न एवं मध्यम वर्ग के परिवारों में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है। 2014 लोकसभा चुनाव के पहले पेट्रोल डीजल के भाव को लेकर बहुत हो हल्ला किये, बड़े बड़े वादे किए गए जब की उस वक़्त कच्चे तेल के मूल्य विश्व बाजार में अभी के मुकाबले काफी महंगे हुआ करते थे। लेकिन वर्तमान परिदृष्य अलग है। अभी कच्चे तेल की कीमत में काफी गिरावट आई है। इसके बावजूद देश की जनता को इसका लाभ देने के बजाय उल्टा लोगो की जेबें खाली की जा रही हैं। वर्तमान समय में लोगो को ज्यादा से ज्यादा मदद उपलब्ध कराना होगा ताकि उनको राहत मिल सके।


वर्तमान समय में एक तरफ जहां समूचा देश वैश्विक महामारी से जूझ रहा है, अधिकांश सेवाएं अभी-भी बंद हैं, बहुत बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार बैठे हैं, फलस्वरूप उनके पास आय का कोई साधन नहीं है , जिसका परिणाम आज बाजार में देखने को मिल रहा है कि लोगों के पास क्रय शक्ति नहीं के बराबर रह गई है। दूसरी तरफ हम देख रहे हैं कि अर्थ चक्र के लिए अत्यंत आवश्यक घटक डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बे-लगाम बढ़ोत्तरी की मार भी सबसे ज्यादा उसी वर्ग पर पड़ती है जिनकी क्रय शक्ति वर्तमान समय में फिलहाल न के बराबर है।


 अतएव वर्तमान परिस्थितियों में अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के साथ ही केन्द्र सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बनती है कि वह एक तरफ जहां निम्न और मध्यम वर्ग के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन करें तथा पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर अंकुश लगाएं ताकि आसमान छूती मंहगाई को नियंत्रित किया जा सके और आम नागरिक राहत की सांस ले सकें।


 


(लेखक बलवंत सिंह खन्ना,कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के समाज कार्य विभाग के पूर्व छात्र एवं युवा सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ समसामयिक मुद्दो के विचारक हैं )


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